Fir Kabhi

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Location: Fatehgarh, Utter Pradesh, India

I am a theologian of Naqshbandiya stream of Sufism. I am independent research writer and publisher.

Tuesday, January 18, 2011


संस्कार वाहिनी 
शुक्रवार; जनवरी २१, २०११
पढ़ाई के दिनों  में कभी हमनें लिखा था, "ब्लाउज को आया पसीना; भीग गयी गोरी". भला कौन नहीं जानता की पसीना किसको आता है और भीगता कौन है? ब्लाउज नारी के जिस्म के किस अंग को कवर करता     है? नारी का जो अंग अपना खून पिला पिला कर हमें जवान बनाता है, उसी के अध्खुलेपन को अश्लीलता का नाम देते हुए किसी को शर्म क्यों नहीं आती?
रंगमंच की तारिकाओं पर छींटाकसी करने से पहले  उस  दर्जी   को कुछ क्यों नहीं कहते जिनके लिए वे बदनाम होतीं हैं. ज़रा सोचो की सच क्या है?


गुरूवार ; जनुअरी २०,२०११
 
तमाम ज़माने से दुआएं भीख मांग कर, 
जिनके लिए संजो-संजो कर रखते रहे थे हम '
उन्हीं ने आज हम पर फतवे जारी कर दिए हैं .
कसूर हमारा बस यही था की हमने किसी की सुनी थी .
उसने हमारा रुझान जानना चाहा था '
हमने  अपना दिल खोल कर दे दिया था.
सवाल उसका था अश्लील सिने-तारिकाओं के घटते पहनावे पर,
हमने उसके दिल की सफाई कर दी.
सवाल उसका नया नहीं था, अकबर की शायरी में हमने पढ़ा था,
"अकबर जो चंद बे-पर्दा बीबियाँ जातीं देखीं;
शर्म से कलेजा जा के ज़मी में धस गया;
पूंछा जो आपका पर्दा कहाँ गया?
कहने लगीं की अक्ल पर मर्दों के पढ़ गया"
 
बुद्धवार, १९ जनुअरी  २०११.
आजकल अकबर अलाहाबादी की एक 'शेर' ज़हेन से हटती नहीं है. आप भी ग़ौर फ़रमाइएगा;
"हम ऐसी किताबों को काबिले ज़ब्ती समझते हैं ,
जिनको पढ़ कर बेटे बाप को खाफ्ती समझते हैं "